इस बार , इस साल देखा मैंने ,
अपनी आंखों से धरती के रंग में रंगे ,
प्रिय किसान मित्र को ,मिट्टी के कीचड़ से सने ,मिट्टी के लाल प्रिय किसान मित्र को ,हर रोज मैं अपने घर के छत से - देखतानित - रोज बदलते इनके ढंग को ,कैसे हुई शुरुआत - इस सालबीज से पौधे की देखा -इन्हे पालता - पोसता ,प्रिय किसान मित्र को ,बिन मिट्टी में मिले ,दबे सृजन जीवन का होता नहीं ,बिन ताप , थपेड़े हवा केजीवन सुदृढ़ बनता नहीं ,खुब जानते है येमिट्टी और मौसम के मिजाज को ,जैसे घुले - मिले और पले - बढ़े होयही इन्ही के आंगन में ,है अद्भुत , रहस्यमयी शक्ति इनमें
ऐसा यकीन होता है ,वरना ऐसे कैसे ??जीवन संभव होता है !
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